बंगाल में पीना तो दूर, नहाने लायक भी नहीं गंगा का पानी!

विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार, करे हाहाकार, नि:शब्द सदा, ओ गंगा तुम, ओ गंगा बहती हो क्यों? नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई, निर्लज्ज भाव से बहती हो क्यों?

भारत रत्न भूपेन हजारिका का यह गीत मानो मृत्यु शय्या पर पड़ीं जीवनदायिनी गंगा के लिए विलाप है। गंगोत्री से गंगासागर तक की अपनी लगभग 2,510 किलोमीटर की यात्रा के दौरान गंगा को न जाने कितनी यातनाएं सहनी पड़ रही हैं।

110 कैनल का रूख भी गंगा की ओर

उत्तराखंड के पहाड़ों से उतरकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड होते हुए बंगाल में सागर में विलीन होने से पहले गंगा इतनी मैली हो चुकी होती है कि पीना तो दूर, उसका पानी नहाने लायक भी नहीं रह जाता। पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल में फरक्का से लेकर गंगासागर तक कहीं भी गंगा का पानी नहाने लायक भी नहीं बचा है। मुर्शिदाबाद जिले के बहरमपुर (जहां से गंगा बंगाल में प्रवेश करती है) में 100 मिलीमीटर गंगा जल में 79,000 कैलीफोर्म बैक्टीरिया पाए गए हैं, जबकि स्वास्थ्य मानकों के मुताबिक पीने के लिए यह पारंपरिक ट्रीटमेंट बिना और संक्रमण-मुक्त किए जाने के बाद 50 कैलीफोर्म बैक्टीरिया या उससे कम होने चाहिए।

वहीं, नहाने के लिए 5,000 कैलीफोर्म बैक्टीरिया या उससे कम होना जरूरी है। कोलकाता के गार्डेनरीच इलाके में गंगा जल को सर्वाधिक प्रदूषित (1,30,000 कैलीफोर्म बैक्टीरिया) पाए गए हैं। इसके बाद दक्षिणेश्वर में इसमें 1,10,000 कैलीफोर्म बैक्टीरिया पाए गए हैं।

पूरे बंगाल में सिर्फ 44 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट

जाने-माने पर्यावरणविद् एवं तीन दशक से अधिक समय से गंगा के संरक्षण की मुहिम में जुटे सुभाष दत्ता ने कहा कि पूरे बंगाल में वर्तमान में सिर्फ 44 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं, जबकि जरूरत 144 की है। परिचालन कर रहे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में से ज्यादातर का पूरी क्षमता पर इस्तेमाल भी नहीं हो रहा। एक गंभीर समस्या यह भी है कि बंगाल में ज्यादातर घर सीवेज सिस्टम से कनेक्ट नहीं हैं। राज्य में 220 फाल आउट प्वाइंट्स हैं, यानी वह जगह जहां से नालों का पानी सीधे आकर गंगा में मिल रहा है, वहीं 110 कैनल का रुख भी गंगा की ओर है।

औद्योगिक कचरे से भी मलिन हो रही गंगा

गंगा मिशन के राष्ट्रीय सचिव प्रह्लाद राय गोयनका ने कहा कि औद्योगिक कचरे से भी गंगा तेजी से मलीन हो रही है। कोलकाता, हुगली, नदिया, उत्तर व दक्षिण 24 परगना और हावड़ा जिलों में गंगा के किनारे जूट व कपड़े की बहुत सी मिलें और चमड़े के कारखाने हैं। उनका सारा ठोस व तरल कचरा सीधे गंगा में फेंक दिया जाता है।

बंगाल में सिर्फ गंगा ही नहीं, महानंदा, तीस्ता, रूपनारायण, मयूराक्षी समेत 17 नदियों में से किसी का भी पानी नहाने लायक नहीं है। इस बारे में गोंदलपाड़ा, हेस्टिंग्स, इंडिया समेत चार जूट मिलों के मालिक संजय काजडि़या ने कहा- ‘हम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सभी मानदंडों का पालन करते हुए जूट मिल चलाते हैं। हमने तो गोंदलपाड़ा जूट मिल में अपना सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी लगाया हुआ है।’ -प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तरफ से नियमों की अनदेखी पर समय-समय पर कार्रवाई की जाती है। पिछले साल जुलाई में विभिन्न नगर निकायों पर 20 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था। बोर्ड ने गंभीर रूप से प्रदूषण फैला रहे 400 उद्योगों को चिन्हित किया है। इनमें से ज्यादातर गंगा के किनारे हैं।

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